मंगलवार, 29 नवंबर 2011

शफ़्फ़ाफ़ हीरे लखनऊ !................

शफ़्फ़ाफ़ हीरे लखनऊ !

-अरुण मिश्र.

   

(लखनऊ शहर में इस समय 'लखनऊ महोत्सव' चल रहा है |
 इस अवसर पर दुनिया भर में सभी लखनऊ को चाहने वालों
 एवं लखनऊ को प्यार करने वालों को यह रचना समर्पित है |
 यह पूरी ग़ज़ल पिछले वर्ष २९ नवम्बर २०१० की पोस्ट में
 उपलब्ध है | -अरुण मिश्र.)

ऐ ! अवध  की   खान   के  शफ़्फ़ाफ़   हीरे ,  लखनऊ।
बेशक़ीमत  इल्मो-फ़न   के ,  ऐ   ज़ख़ीरे ,   लखनऊ।।



बज़्मे-तहज़ीबो-अदब  के जल्वों  पे   हो  के  निसार।
हम    हुये    शैदाई    तेरे ,   धीरे  -  धीरे     लखनऊ।।




चार - सू   चर्चा    में    है ,  योरोप   से    ईरान  तक।
लज़्ज़ते - शीरीं - जु़बानी , औ’   ज़मीरे  -  लखनऊ।।




लच्क्षिमन जी ने किया आ कर के बिसरामो-क़याम।
कुछ   तो   ऐसा  है,  तिरे  नदिया  के  तीरे, लखनऊ।।
                                     *





रविवार, 20 नवंबर 2011

ZE-HAL-E MISKIN............A TRIBUTE TO AMIR KHUSRAU

अमीर खुसरो की इस अमर रचना को मेरी विनम्र साहित्यिक प्रणामांजलि |
-अरुण मिश्र.  

ज़े-हाल-ए  मिस्कीं  मकुन  तगाफुल,        
दुराय      नैना,    बनाय       बतियाँ |
कि   ताब-ए  हिज्राँ  नदारम  ऐ   जाँ  ,
न    लेहु    काहे     लगाय   छतियाँ ||

न  हाल-ए-ख़स्ता की कर तगाफ़ुल ,
दुराय      नैना ,    बनाय    बतियाँ |
कि ,हिज्र  की  ताब  रखूँ  न  ऐ जाँ ,
न   लेहु    काहे    लगाय   छतियाँ ||

शबान-ए  हिज्राँ  दराज़   चूँ   ज़ुल्फ़,   
व  रोज़-ए वसलत  चो उम्र कोताह|        
सखी    पिया  को  जो  मैं  न   देखूं       
तो    कैसे    काटूँ   अँधेरी  रतियाँ ||.

दराज़   ज़ुल्फों   सी  हिज्र  की  शब ,
औ ’उम्र ज्यूँ कम,मिलन के दिन हैं |
सखी   पिया   को   जो   मैं  न  देखूं ,
तो    कैसे   काटूँ     अँधेरी   रतियाँ ||

यकायक अज़ दिल दो चश्म-ए जादू ,
बसद     फ़रेबम       बबुर्द     तस्कीं |
किसे   परी    है    जो    जा    सुनावे ,
पियारे    पी    को      हमारी  बतियाँ ||

यकायक  दिल  से  दो  जादू  नैनों 
ने  , सद   फ़रेबों  से   चैन   छीना |
किसे    परी  है   जो   जा   सुनावे ,
पियारे  पी  को   हमारी  बतियाँ  ||

चो  शम्म’अ  सोजाँ  चो  ज़र्रा  हैराँ ,
हमेशा   गिरयां   बे   इश्क आँ  मेह |
न   नींद    नैना     न    अंग    चैना ,
न    आप   आवें   न   भेजें   पतियाँ ||

जली  शम’अ  की परीशाँ लौ  सी ,
मैं  इश्क  की  आग  जलूँ  हमेशा |
न    नींद   नैना    न   अंग   चैना ,
न  आप  आवें   न  भेजें   पतियाँ ||

बहक्क़-ए रोज़-ए विसाल-ए दिलबर,      
की     दाद  मा  रा     ग़रीब   खुसरौ |
समेत    मन     को      वराय    राखूँ ,
जो    जाए  पाऊँ  पिया  के  खतियाँ ||

पिया मिलन के सुदिन के हक़ में ,
अगर  हो   हासिल  ग़रीब खुसरौ |
समेट    मन   को    वराय   राखूँ ,  
जो  जाए पाऊँ  पिया के  खतियाँ ||
                            *

Ze-hal-e miskin makun taghaful,
Duraye naina banaye batiyan;
Ki  tab-e hijran nadaaram ay jaan,
Na lehu kaahe lagaye chhatiyan.

Na hal-e-khasta ki kar taghaful,
Duraye naina banaye batiyan;
Ki, hijra ki tab rakhun na ay jaan,
Na lehu kaahe lagaye chhatiyan.

Shabaan-e hijran daraaz chun zulf,
Wa  roz-e waslat cho umr kotaah;
Sakhi piya ko jo main na dekhun,
To kaise kaatun andheri ratiyan.

Daraaz zulfon si hijra ki shab,
Au’ umr jyun kam milan ke din hain;
Sakhi piya ko jo main na dekhun,
To kaise kaatun andheri ratiyan.

Yakayak az dil do chashm-e jaadoo,
Basad farebam baburd taskin;
Kise pari hai jo jaa sunaave,
Piyaare pi ko hamaari batiyan.

Yakayak dil se do jaadoo nainon
Ne, sad farebon se chain chheena;
Kise pari hai jo jaa sunaave,
Piyaare pi ko hamaari batiyan.

Cho sham’a sozan cho zarra hairan,
Hamesha giryan be ishq aan meh;
Na neend naina na ang chaina,
Na aap aaven na bhejen patiyan.

Jalee sham’a ki parishan lau si,
Main ishq ki aag jalun hamesha;
Na neend naina na ang chaina,
Na aap aaven na bhejen patiyan.

Bahaqq-e roz-e wisaal-e dilbar,
Ki daad ma ra ghareeb Khusrau;
Samet man ko waraaye raakhun,
Jo jaaye paaon piya ke khatiyan.

Piya Milan ke sudin ke haq men,
Agar ho haasil ghareeb Khusrau;
Samet man ko waraaye raakhun,
Jo jaaye paaon piya ke khatiyan.
                            *

बुधवार, 9 नवंबर 2011

मीत मेरे संग मेरे चल......



ग़ज़ल 


-अरुण मिश्र  




मीत  मेरे,   संग  मेरे  चल।
करने,  जग  के  फेरे,  चल॥


चलना  ही   तो   जीवन  है।
जीवन  की  धुन   टेरे  चल॥

रात  बहुत  आराम  किया।
उठ  चल, सुबह-सबेरे चल॥


सूरज,  जगा  रहा  तुझको।
कब के  ख़त्म  अँधेरे  चल॥


भव-सागर  की  लहरों  में।
कश्ती  अपनी, खे  रे! चल॥


वंशी-वन    है,  बुला   रहा।
लकुट-कमरिया ले रे!चल॥


बंधन, बाधा,  संशय, भ्रम। 
तोड़  के   सारे   घेरे,  चल॥


साधो, सच्ची साध  अगर।
मन का  मनका, फेरे चल॥


ठगिनी, ठगने  को  तैयार।
पीछे   पड़े,     लुटेरे,   चल॥                


सांझ   हुई, सिमटा  मेला।
चल  नट, अपने  डेरे, चल॥
                  *