रविवार, 25 मार्च 2018

रामनवमी की मंगलकामनाएं

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दशरथ-हृत्व्योम-बिहारी हे!

  - अरुण मिश्र

 जय  राम,  राम,  जय  रामचन्द्र।
 शोषित- जन- मन-विश्राम,चन्द्र।
 दशरथ -  हृत्व्योम - बिहारी    हे!
    रघुकुल  के  चिर-अभिराम चन्द्र।।

               शुचि, जीवन-मूल्यों के  मापक।
               हे पूर्ण-पुरुष! अग-जग-व्यापक।
               यश-वाहक,   संस्कृति-संवाहक।   
               मर्यादाओं       के       संस्थापक।।

    हे!   दीन - हीन   के   मन  के   बल।
    मुनि-हृदय-मीन, तव-भक्ति सुजल।
    हे!    चिर-नवीन- शुभ-आस-रश्मि।
    हे!  आर्त - दुखी- जन    के    संबल।।

               भारत-भुवि  के   गौरव   ललाम।
               हे! संत- सरल- चित- परमधाम।
               निष्काम !  करो  लीला- सकाम।
               हे!  राम,  राम,   जय   राम-राम।।
                                         *
(पूर्वप्रकाशित )

रविवार, 31 दिसंबर 2017



इस नए साल में ये पहली दुआ है मेरी......

-अरुण मिश्र 

‘‘दिल की धरती
  कभी बंजर नहीं होने पाये।
  आँच मन की कभी
  मद्धिम नहीं होवे, या रब!
  चमके उम्मीद का सूरज
  औ’, बरसें प्यार के मेह।।

  मन में गहरे हैं पड़े
  बीज, कितनी सुधियों के-
  गुज़िश्ता बरसों के;
  उनमें नये अँखुए फूटें।।
  फिर से लहरायें
  नई फसलें,
  नई खुशिओं की।।

  इस नये साल में।
  ये पहली दुआ
  है, मेरी।।’’
        *


(पूर्वप्रकाशित)

गुरुवार, 30 नवंबर 2017

हम ने बोलेंगे मगर...



हम ने बोलेंगे मगर..
-अरुण मिश्र 


हम ने बोलेंगे मगर, फिर भी बुलाओ तो सही।
यूँ  कि हम रूठे हुए, हमको मनाओ तो सही।।

नाज़ो - अंदाज़  के,  सुनते हैं  बड़े रसिया हो।
मैं भी तो  जानूँ ,  मेरे नाज़   उठाओ तो सही।।

बात छोटी सी भी,  तुम दिल से लगा लेते हो।
मैं बड़ी चीज न कुछ, दिल से लगाओ तो सही।।

हाँ  हमें  हीरों  के  कंगन  की   तमन्ना  तो  है।
तुम हरे काँच की कुछ चूड़ियाँ लाओ तो सही।।

हम 'अरुन' फूलों को समझेंगे, फ़लक के तारे।
तुम मेरे जूड़े में , इक गजरा सजाओ तो सही।।
                                    *                                     

शनिवार, 25 नवंबर 2017

धीरे-धीरे वो मेरे एहसास पे छाने लगे....





धीरे-धीरे वो मेरे एहसास पे छाने लगे....

-अरुण मिश्र 

धीरे - धीरे    वो    मेरे   एहसास   पे    छाने  लगे।
ख़्वाबों में बसने लगे,  ख़्यालों को  महकाने  लगे।।

उनकी सब बेबाकियाँ जब हमको रास आने लगीं।
तब  अचानक  एक दिन,  वो  हमसे शरमाने लगे।।

जिनकी  आमद  के  लिए  थे  मुद्दतों से मुन्तज़िर।
उनका  आना तो  हुआ  पर,  आते ही  जाने लगे।।

देखने  लायक  वो मन्ज़र  था,  जुदाई  की  घड़ी।
अश्क अपने  पोंछ कर, हमको ही समझाने लगे।।

बहकी-बहकी गुफ्तगू थी जब तलक पहलू में थे।
हमसे भी ज्यादा 'अरुन', वो ख़ुद ही दीवाने लगे।।
                                         *

बुधवार, 8 नवंबर 2017

ज़िस्म ये रूह है, मिट्टी है, ख़ला है, क्या है ?



ज़िस्म ये रूह है, मिट्टी है, ख़ला है, क्या है ?

-अरुण मिश्र  

ज़िस्म  ये  रूह  है,  मिट्टी  है,  ख़ला  है,  क्या है ?
नूर   है,  आग   है,   पानी  है,  हवा  है,   क्या है ?

साँस   की   बंसरी   को    रोज़    नये  सुर   देता;
कोई  फ़नकार  है,  शायर  है,  ख़ुदा  है,  क्या है ?

कभी  डसती,  कभी  लहराती,  कभी  छा जाती;
कोई  नागिन है,  ज़ुल्फ़  है  कि,  घटा है,  क्या है?

आँखें   इस्रार   करें,   लब  पे  मुसल्सल   इन्कार;
कोई आदत है  कि,  ज़िद है  कि, अदा है,क्या है?

इश्क़ को हुस्न के रखते हो मुक़ाबिल जो, 'अरुन ';
है  ये  ख़ुद्दारी,  जुनूँ   है  कि,  अना  है,   क्या  है ?
                                        *

सोमवार, 23 अक्तूबर 2017

गर दिवाली का नतीजा........


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गर दिवाली का नतीजा न दिवाला होता...
-अरुण मिश्र 

गर  दिवाली  का  नतीजा  न  दिवाला    होता। 
चाँद  का  मुँह  तो अमावस को न काला होता।।

तेल - बाती   के   लिए   सारे   दिए   हैं  बेचैन।
रौशनी कैसे  हो,  कुछ  जलने  तो वाला  होता।।

बिना  मिठाइयां, फीके   तो  न   लगते त्यौहार।
काश ! खाया  न   कभी,  मीठा  निवाला  होता।।

गुड़  कहाँ,  दूध  कहाँ, आँटा   कहाँ  से  लायें।
इस से  बेहतर  था,  कोई  ख़्वाब  न पाला होता।।

तंगदस्ती  से   ‘अरुन’ ,  तंग  रहे  होंगे  जरूर।
वर्ना  दरवाज़े  से,  क्या  दोस्त को  टाला  होता।।
                                  *